आओ फिर से “ठेठ पहाड़ी बन जाए “

जंगल जल रहे हैं ,प्रकृति अपना तांडव दिखा रही है ,
यूँ ही नहीं “गौरा देवी” ने “चिपको” चलाया था ,एक “कल्याण सिंह” ने “मैती आंदोलन” चलाया था,
भूल ही जाते हैं हम उनके योगदान को ,बस किताबों के कुछ पन्नों में ही उनका ज़िक्र है ,
क्योंकि हमें “पर्यावरण” से ज़्यादा एग्जाम की फिक्र है ,
बस पढ़ा ही है ,गुना नहीं ,गुन लेते तो शायद आज ये जंगल न जलते |
क्योंकि पहले लोग पढ़े लिखे भले ही न हो ,पर वो पेड़ों पर “रक्षा धागा” बाँध कर उसकी रक्षा ज़रूर करते थे ,
पेड़ों का महत्व ,पानी का महत्व ,उन्हें ज़रूर पता था ,भले ही उनके पास हमारे जैसा ज्ञान न था ,
पर पर्यावरण के महत्व का उन्हें एहसास ज़रूर था |

अब देखो न ,आग आग सब चिल्ला जो रहे हैं ,इसमें भी तो हमारा ही योगदान है ,
मानव जनित कृत्य का ही ये परिणाम है ,
बस भुक्तभोगी यहाँ इंसान नहीं है ,वो तो कुछ बेज़ुबान हैं ,
ये चार दिनों का सोशल मीडिया पर बवाल जो मचा के रखा है ,
कुछ दिन बाद सब भूल जायेंगे ,क्योंकि ए० सी ० में बैठ के सोशल मीडिया पर ये आप जो शेयर करते हो ,
इस सब प्रक्रिया में आपका योगदान आपको पता भी नहीं होगा ,आओ थोड़ा ही सही कुछ अपनी तरफ से भी योगदान करें ,
कुछ दिनों के लिए ही सही अपने ए० सी ० को आराम दे दे ,
गर्मी तो सब के लिए ही एक जैसी है ,हमारे पास छत तो है ,
जो बिना छतों के हैं ,उनका सोच कर ,खुद को इस गर्मी में पंखे से ही आराम दें|
और जो योगदान कर गए हैं ,उस योगदान का अब कोई मोल नहीं ,
प्रकृति बदला ले रही है ,अब संभल जाइये ,
क्योंकि ये आग ,कुछ घस्यरियों के फुर्सत के ,कुछ दुःख सुख के पल ले गयी ,
कुछ ग्वालों के जंगलों के मज़ेदार किस्से ले गयी ,ये आग बच्चो के खेल के मैदानों को संग ले गयी ,
कुछ किस्से थे गिल्ली डंडो के ,कुछ क्रिकेट के ,ये बच्चों के बचपन के कुछ हिस्से चुरा ले गयी ,
हाँ  ये ले गयी बेज़ुबानों की जान ,किसी का पशुधन और किसी का जीने का सामन ,
अभी भी वक्त है जाग जाइये ,कुछ कदम आओ हम भी उठाये ,
फिर से  “उत्तराखंड” को हरा भरा बनाये ,
“विकास” को  “उत्तराखंड”से दूर ही रखो ,आओ फिर से “सुन्दर लाल बहुगुणा “ की नीतियों को अपनाये |
हम ऐसे ही सीधे सादे भले हैं ,नदियों को मत बांधों,जंगलों को मत काटो ,
प्रकृति का वैसे ही रहने दो ,और आओ फिर से सब “सुंदर लाल बहुगुणा” बन जाये ,
“विश्वेश्वर दत्त सकलानी” को खुद में फिर से जगाये ,
आओ फिर से “ठेठ पहाड़ी बन जाए “||

 

3 thoughts on “आओ फिर से “ठेठ पहाड़ी बन जाए “

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