ईद मुबारक

चाँद भी ईद का अपना मुखड़ा दिखा ही गया
,साथ ही कई सारी यादों के पिटारे खोल गया ,
वो दोस्तों की जोड़ी ,ईद की दावत और आंटी की ईदी,
और हमारी खज़ाना हाथ लगने जैसी ख़ुशी ,
वो अज़ान की आवाज़ और रोज़े की आहट,
और फिर बिछड़ गए दोस्त सारे ,नया शहर नए दोस्त ,
कभी ऑफिस में कभी होली की गुझिया ,और कभी ईद के आने पर ,
सर की अम्मी का ढेर सारा प्यार और तरह तरह की सिवैय्या ,
वो मीठी ईद की मीठी सी दावत ,
और वो मीठा सा स्वाद ज़बान में घुल जाता था ,
जब  घर से किसी के सिवईयों का डब्बा आता था ,
होली पर सब एक ही रंग में रंगते थे क्या हरा, क्या केसरिया ,
रंग भी अलग होते हैं , ये तो अब जाना है ,
पहले तो बस यारों का ज़माना था ,
दिवाली में पटाखे, फुलझड़िया और बम जलाते थे ,
उस धुएँ के साथ रिश्ते भी उड़ गए ,
वो सुबह चार बजे उठ के नमाज़ अता करती थी,और हम पूजा करते थे ,
हमें उसने बताया था ,कि जुम्मे को पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं और
हम सुबह दिया जलाते थे ,पर हम साथ थे ,
हम अलग-अलग थे ,पर मन तो एक था ,जाने कितने लम्हें हैं ,
कुछ खट्टे ,कुछ मीठे ,
बस कड़वापन बिलकुल भी नहीं है ,
कैसे भुला दे यारों कि यारियां ,
वो दिन जब बस्ते कंधे पर लटका कर साथ स्कूल जाते थे और साथ ही कॉलेज में भी कदम रखा था ,
वो आइसक्रीम ,वो चॉकलेट ,वो बर्थडे,
उसकी शादी में उससे मिलने जाना ,उसके सुनहरे दिनों से कुछ पल चुराना ,
कैसे भूल पाएंगे वो दोस्ती जो आज भी बहुत प्यारी है ,
पता नहीं क्यों सब अलग हो गया ?
वो तो संग हमारे मंदिर भी आता था ,टीका भी लगवाता था ,
तब से अब तक जो साथ है ,दोस्त वो एक खास है ,कैसे बस एक उसके नाम से ,
दोस्ती भूल पाएंगे ,उसकी बिटिया जब फूफी बुलाती है ,वो ख़ुशी कहा छुपा पाएंगे ,
उस नन्ही सी बच्ची को क्या रंगों का अंतर समझा पाएंगे ?
सम्मान ही तो चाहिए ,पहचानते तो हो ही एक दूसरे को बरसों से ,
क्यों न सम्मान के बदले सम्मान ही पाए ,सब एक दूसरे को समझ जाएँ ,
तो चलो आओ फिर से बस हिंदुस्तानी कहलाएं ||
ईद मुबारक ||

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