क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?

तेरी कोख में तेरी ही परछाई को जब तू कचरे के डब्बे में डाल के आती है ,
चाहे जन्मी या अजन्मी ,उसकी धड़कनों का शोर ,उसका रोना ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
खेलती हुई तेरे आंगन में ,बचपन से जवान होने तक ,
तेरे अधूरे सपनों के बोझ के तले,उसके चकनाचूर होते ख्वाबों का शोर ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
बचपन से ही परायी अमानत कह कर पराया कर देते हो जिसे ,
उसका अपने ही घर से अलग होने का एहसास जो उसके मन में सवाल बनके ज़िन्दगी भर पलता है ,
उसका जवाब,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?

अपना घर छोड़ के जब वो तेरे घर आती है ,
तेरी अनगिनत, मांगों को पूरा करने में ,तुझे खुश रखने के लिए जब वो खुद मिट जाती है,
और उसकी बिखरती खुशियों का रोना ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
अलग माहौल में एक दोस्त को ढूंढती वो ,उसके बदले तेरा ये मिज़ाज़ ,
उसको इस घर से भी जब पराया कर देता है ,
उसकी आँखों का सूनापन ,
क्यों ?तुझे दिखाई नहीं देता ?
तेरे ही घर में जब दहेज़ की आग में वो जलती है ,
या फिर इस डर से ज़िन्दगी भर का जोग ले लेती है,
उसके मन से उठती चीखों का शोर ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
अगर सूनी रह जाये उसकी गोद कभी ,
उस पर तेरे तानों का मरहम हर रोज़ लगाना ,
उसकी गोद में रोता एक माँ का दिल ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
ऑफिस से जो कभी शाम को आये वो थक कर ,
और तेरा उससे हर काम की उम्मीद लगाना ,
उसकी टूटती हड्डियों का चटकना ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
गर तुझे वो पराया कर दे ,तेरे बुढ़ापे में तुझे अकेला छोड़ दे ,
ये शोध का ही तो प्रतिशोध है ,
क्यों ?तुझे ये शंखनाद अब सुनाई नहीं देता?
तूने ही उसे अपना जैसा बना दिया ,पुराने सांचे से निकल कर जब वो तुझमें से ही एक बन जाती है ,
जब अपने सांचे को वो खुद ही तोड़ देती है ,
उसके बिखरने से नया बनने के सफर में उसके टूटने का दर्द ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देता ?
जब तू उसके रंग का ,उसके ढंग का मज़ाक कभी सामने तो कभी सोशल मीडिया पर बनाती है ,
बड़े गर्व के साथ जब तू उसके पोस्ट शेयर करती है ,
तब तेरी खुद की ही जगहंसाई ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देती ?
शादी कब करेगी ?कैसे कपड़े पहनती है ?लव मैरिज की है ?बच्चे कब होंगे ?
माँ का पल्ला अब छोड़ दे ,कैसी माँ है ,बच्चा भी ढंग से नहीं संभाल सकती ?
पढ़े लिखे का घमंड है ,नौकरी का घमंड है ,अरे घरेलू औरतों के पास काम ही क्या है ?
कितने लड़के दोस्त है इसके ,चाल चलन ही ख़राब है ,
जब तू ऐसे सवालों से उसे छलनी करती है ,तो तेरे औरत होने पर धिक्कार होना ,
क्यों ?तुझे महसूस नहीं होता ?
मत जला मोमबत्तियां ,
क्योंकि उन लोगो ने तो एक दिन , शरीर को ही दर्द दिया ,
क्योंकि वो जानवर थे ,
तू तो मन को दर्द देती है ,हर रोज़ ,
उस दर्द की आवाज़े ,
क्यों ?तुझे सुनाई नहीं देती ?

कब तक मर्दों को दोष देगी ,क्योंकि तूने ही तो उनको ये अधिकार दिए हैं ,
तेरी कोख से मर्द बनने तक ,तूने ही ये संस्कार दिए हैं ,
“अरे लड़की है क्या जो रोता है ?बीवी ज़बान चलाती है तो दो लगा दे ,
तू लड़का है तू सब सही करता है ,तू ही तो घर को रोशन करता है ”
अगर इन बातों को सुन कर भी तू अनसुना करती है ,तो धिक्कार है तेरे औरत होने पर ,
जिस दिन तू गलत के खिलाफ आवाज़ उठादे ,अपने बेटे को भी बेटियों सा पाले ,
एक औरत हो कर जिस दिन तू उसका साथ दे ,
उसके दुःख में जब तेरा कन्धा उसके गम को हल्का करे ,
जब किसी लड़की को परायेपन का एहसास न हो ,
उसके सपनों को उड़ने के लिए जब तू मिलके उसको वो आसमान दिलादे ,
अपने सवालों से जब तू उसको छलनी न करे ,
हर घर में वो खुशियों से जिस दिन भर जाएगी ,
उसी दिन तू एक “औरत” कहलाएगी ,जो एक “औरत “को समझती हो ||
तब तू दुनियां में सशक्तीकरण का परचम फहराएगी ,हाँ , तू खुद से मिल जाएगी ||
हाँ ,तू एक “औरत ” बन जाएगी ||

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