पिछौड़ा

आज एक उत्तराखंडी ऑनलाइन डांस का आयोजन यूँ करवाया गया ,
कि जाने कितनी ही यादों से मिलवाया गया ,
पिछौड़ा पहनना था ज़रूरी इसमें ,
जो निकाला उसने अपना पिछौड़ा अपने बक्से से ,जाने कितने एहसास संग उसके आ गए ,
वो “सात फेरे” वो एक बार फिर से ले आयी ,कुछ नए कल के सपने उसके मन को गुदगुदा गए ,
पर ये क्या ?ये पिछौड़ा तो छोटा हो गया ,फिर वो आज में आ गयी कि अरे देखो न ,
इतने सालों में कमर में बच्चों  की फ़िक्र बाँध ली है ,हाथों में गृहस्थी की बागडोर सम्हाल ली है ,
चेहरे पर सलीके से मेकअप लगाना आ गया है ,हाँ ,मेकअप ही तो है ,
एक चेहरा बनाना है जो दुनियां को दिखाना है ,बाकि अपने असली चेहरे से तो वो खुद भी नहीं मिल पातीं ,
ये बढ़ी और घटी कमर, बहुत सारे किस्से छुपाये है ,
अल्हड़ से समझदारी तक का सफर इस पिछौड़े में समाया है ,अपने घर को मायका कहलाने का दर्द भी इसी के संग आया है ,
कुछ सौगातें भाई के प्यार की वो इसमें बाँध लायी ,खोल लेती है , अकेले में इन्हें और फिर से बाँध देती है एक गाँठ कसके ,जिससे की कोई और न खोल ले इसे कहीं ,
ये पिछौड़ा जब पहना तब ही अपना “बचपन” वो उतार आयी , और बंध गयी कितने अनजाने रिश्तों कि डोर में ,
संग इसके जब कदम रखा था एक नए “मकान” में ,तब जाना कि हाँ ये ही वो “ससुराल” है ,
और ससुराल आज भी बिलकुल वैसा ही है ,बस वो बदल गयी ,
मायके ने पराया कर दिया ,और ससुराल ने कभी अपनाया ही नहीं ,
हाँ ,ये उस परायेपन का दंश हमेशा के लिए  ओढ़ा  जाता है ,
तभी तो इसे यूँ सम्हाल के रखा जाता है ,क्यूंकि हर रोज़ इतनी खुशियां ,इतना दर्द,इतने सपने और इतने आंसू कोई एक साथ कैसे सह पायेगा?
बचपन में जब पिछौड़ा पहन के नाचती थी तब जाने कितनी खुशियां समेट लेती थी ,तब नहीं जानती थी ये कि इसमें ये लाल पीली बिंदिया क्यों हैं ,ये इतना भारी क्यों होता है ?
हाँ ,इसमें कुछ आसुओं का वज़न होता है ,कुछ सपने होते हैं ,
इसमें अपनेपन की गर्माहट हैं ,नयी ज़िन्दगी की आहट है ,
जब उसके ही अंश को एक नाम मिलता है ,तो ओढ़ लेती हैं वो इसे ,
हर शुभ काम की शुरुआत है ,उसका श्रृंगार है ,ये पिछौड़ा ,
कभी शादियों में बरसों बाद बिछड़ी बहनों और सखियों की महफिलों का साथी है ,
किसी की विदाई पर अपनी विदाई का एहसास करते कुछ आंसू हैं ,
कुछ चुभन भी है इसमें थोपे गए रिश्तों की ,जब भी पहनों उनकी खरोंच लग ही जाती है ,
और हर बार बिखरतीं सपनों की किरचें मन को छलनी कर जाती है ,
पर वो सिर्फ खुशियां ही चुन लेती हैं ,और देखिए न ,
कुछ साल हैं उसकी ज़िन्दगी के जो वो गुज़ार आयी हैं ,
कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं जो इस पिछौड़े की ही सौगात है ,और एक “वो” है जो ,
हर हाल में भी गुलज़ार हैं ,चलिए रख दें अब इस पिछौड़े को ,
अब आज की ज़िम्मेदारियाँ भी निभाई जाए ,और फिर से वो दौड़ पड़ी ..

धन्यवाद||

13 thoughts on “पिछौड़ा

  1. Very thoughtful 💞
    बया करा तेरी शब्दों ने हाल सभी का……

  2. शब्द नहीं मिल रहे हैं, तारीफ के। पिछोड़ा या चुनरी के द्वारा मायके की बेशकीमती यादों को ताजा कर दिया।
    Well done, Niharika

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