अल्मोड़ा का दशहरा

अगर आप अल्मोड़ा वासी हैं या आप कभी अल्मोड़ा रहे हैं तो आपने अल्मोड़ा का दशहरा ज़रूर देखा होगा।
वो अल्मोड़ा की बाज़ार लोगो से खचाखच भरी हुई, इस भीड़ में आपको दिख जायेंगे अपने माता-पिता, आमा बुबु का हाथ थामे ।
नवरात्रि के नौ दिन अल्मोड़ा में हर मोहल्ले में दुर्गा माता बनायीं जाती है और सुबह शुरू होती है माता के खूबसूरत भजनों से, एक भक्तिमय माहौल से और स्कूली बच्चे हर माता की चौकी पर माथा टेकते और प्रसाद लेते हुए जाते हैं, ये हमने भी किया है और सच में वो आठ दिन खुशियों से भरे होते हैं और रात में हर मोहल्ले की अपनी राम लीला होती थी और फिर वही रामलीला घर में बच्चे आपस में करते मिल जायेंगे आपको ।
कन्या पूजन के साथ नवमी को माता का डोला उठता है, सारे मोहल्ले में बनायीं गयी माताओं की झांकियां निकलती थी और उन्हें क्वारब में विसर्जित किया जाता था पर उस दिन सच में बहुत खाली खाली लगता था पर अगले दिन त्यौहार का उत्साह रहता था और रामलीला भी,क्योंकि रामलीला कुछ दिनों तक और चलती थी ।

 

विजय दशमी के दिन घर में त्यौहार मनाने के बाद बड़ी उत्सुकता रहती थी कि कब तैयार होंगे और कब दशहरा देखने जायेंगे और समय से पहले निकलने की जल्दी होती थी क्योंकि अगर एक बार डोला निकलने के बाद गए तो एक तो भीड़ से निकलना मुश्किल और दूसरा जगह भी नहीं मिलती थी, डोला देखने के लिए ज़्यादातर लोग कचहरी बाज़ार में जमा होते थे, दुमंजिला दुकानों की बालकनी में जगह घेरनी होती थी, इसलिए कोशिश रहती थी कि जल्दी से पहुंचे और डोला देखे और इस सब कोशिशों और लम्बे इंतज़ार के बाद शुरू होता था दशहरा का डोला और सबसे पहला पुतला होता था ताड़िका का, अब आप सोच रहे होंगे ये पुतले आते कहाँ से थे?
ये सारे पुतले हर मोहल्ले में बनाये जाते थे, हर मोहल्ला अपना एक पुतला बनाता था और ये सारे पुतले अपने मोहल्लों से निकल कर शिखर होटल के पास इकट्ठे होते थे और मिलन चौक से डोला निकलता था और फिर बाजार से निकलता था जहाँ पर सारे अल्मोड़ा वासी पुतलों का इंतज़ार करते हुए मूंगफली, नमकीन, खाते हुए पाए जा सकते हैं और इसी डोले में आपको बहुत से रिश्तेदार और दोस्त ज़रूर मिल जाते हैं ।
ये तो रही पुतलों की जानकारी और पुतले भी ऐसे वैसे नहीं भीमकाय होते हैं और बहुत मेहनत से उन्हें बनाया और सजाया जाता है और अल्मोड़ा के जैसे पुतले शायद ही आपको कही मिले ।

 

तो चलते हैं पुतलों के डोले में जहाँ सबसे पहला पुतला होता है ताड़िका का, और फिर बाकी पुतले आते थे जो की रावण की सेना होती है और फिर आता है रावण और जब सारे पुतले ख़त्म हो जाते हैं फिर आती है श्री राम की झांकी जिस पर हम फूल और चावल डाला करते थे ।
ये सभी पुतले डोले के बाद अल्मोड़ा स्टेडियम में इकट्ठे होते हैं और वहां पर सबसे अच्छे पुतले को इनाम मिलता है, और फिर वही पर रावण दहन किया जाता है, सारे पुतले जलाये जाते हैं।
इस साल दशहरा का मेला कोरोना की वजह से नहीं हुआ पर यकीं मानिये अल्मोड़ा जैसा दशहरा का मेला आपको कहीं नहीं देखने को मिलेगा और यहाँ के पुतले जैसे पुतले भी कही नहीं मिलेंगे ।

 

अगर आप कभी भी अल्मोड़ा जाएं तो दशहरा के मेले में ही जाने का प्लान बनाये और रंग जाइये अल्मोड़ा के रंग में।
दशहरा का मेला सिर्फ एक मेला नहीं यादें हैं मेरे बचपन की,और उस ख़ुशी की जो मुझे मेले जाने से मिलती थी और अब लिखने पर मिल रही है, कुछ यादें है स्कूल से आते जाते माता की चौकी से पिठिया लगवा कर प्रसाद लेते हुए आने जाने की, दशहरे के इंतज़ार की, मेरे भाइयों के साथ हुड़दंग मचाने की, दोस्तों के अचानक डोले में मिलने की ख़ुशी की, ये सिर्फ दशहरा नहीं, यादें हैं मेरे मायके की, घमंड है अल्मोड़ी होने का, भले ही अल्मोडियों के हज़ार जुमले बने हो पर मुझे बहुत ख़ुशी होती है जब कोई मुझे अल्मोड़ी कहता है ।
ये था दशहरा का डोला एक अल्मोड़ी के दिल से और उससे जुडी भावनाओं से ।
दशहरे की आप सभी को बधाई ।
धन्यवाद ॥

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