बेड़ू रोट और मेरे बुबु के किस्से

बचपन में घी संक्रांति खुशियों भरा त्यौहार होता था ,खुशियाँ आज भी लाता है ये त्यौहार पर बचपन की बात ही कुछ और थी, हमें एक दिन पहले से ही ख़ुशी हो जाती थी कि घी का त्यौहार आएगा और हम बेड़ू रोट खाएंगे ।
तब हमें ये भी नहीं पता था कि जिस दाल से ये रोटी बनती है उसे उड़द भी कहते हैं क्योंकि हमने हमेशा मास की दाल ही सुना ,मास की दाल की पूरी, रोटी जिसे मेरे बुबु बेड़ू रोट कहा करते थे और शाम को पूजा के बाद मेरे बुबु हम सभी को पिठिया लगाते थे उसके बाद सब की नाक में घी लगाते थे जो मुझे बड़ा चिपचिपा लगता था और मेरे बुबु कहते थे लगा ले नातिनी लगा ले नहीं तो अगले जनम में गनेल(घेंघा) बनेगी और फिर तो गनेल से ज़्यादा अच्छा तो घी ही था तो घी शोभायमान हो जाता था हमारी नाक में और फिर शुरु होता था बेड़ू रोट और पहाड़ी साग खाने का सिलसिला, उस समय सबके साथ मिलकर खाने में जो ख़ुशी मिलती थी वो आज कहीं गुम हो गयी है, आज सब है और बेड़ू रोट मैंने भी बनाना सीख लिया है बस नहीं हैं तो मेरी नाक पर जबरदस्ती घी लगाने वाले मेरे बुबु, उनके वो प्यारे किस्से, घी त्यार सिर्फ घी संक्रांति नहीं है,ये हैं यादें हमारे बचपन की ,बुबु के प्यार की और बेड़ू रोट के स्वाद की।
सबसे मज़ेदार बात कि हमें बड़े हो कर पता चला कि इस त्यौहार का नाम घी संक्रांति है क्योंकि हम इसे घ्यू त्यार ही समझते थे,अब बड़े होने पर बहुत कुछ वैसे भी बदल ही जाता है तो घी संक्रांति भी सीख गए हम।
चलते चलते आप सबको घी संक्रांति कीबहुत शुभकामनाएं।

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