कोडिंग और बचपन

आजकल टीवी पर और सोशल मीडिया पर एक ही बात छायी हुई है , बच्चे कोडिंग सीख रहे हैं और एंड्राइड एप्लीकेशन बना रहे है।
मैंने एक विज्ञापन देखा जिसमेंएक छोटा बच्चा  कोडिंग सीख कर एंड्राइड एप्लीकेशन बना रहा है और दुनिया भर के इन्वेस्टर उसे खरीदने के लिए आपस में लड़ रहे हैं और उसकी माताजी बड़े गर्व से सबको ये बता रही है, ये विज्ञापन देख के मुझे खुद पर बड़ी शर्म आयी की तीन साल लगाके मैंने मास्टर्स ऑफ़ कंप्यूटर एप्लीकेशन किया और मैं एक भी एंड्राइड एप्लीकेशन नहीं बना पायी ,मैं क्या मेरे साथ जितने भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर निकले थे ,उनमें से शायद ही किसी ने एप्लीकेशन बनाया हो और अगर किसी ने बनाया हो तो माफ़ी चाहूंगी, आप कमेंट सेक्शन में बता दीजिये।
अगर आप विज्ञापन देखे तो उसमें कोडिंग की न्यूनतम आयु सीमा है 6 साल ,अब मुझे ये समझ नहीं आता की 6 से 10 साल के बच्चे जिन्हे ढंग से अपनी मातृभाषा का ज्ञान नहीं है वो कंप्यूटर की भाषा को कैसे समझ पाएंगे ,और उससे भी ज़्यादा मज़ेदार बात ये है कि जो बच्चे कंप्यूटर को ही नहीं जानते वो एप्लीकेशन कैसे बनाएंगे क्योंकि अब तक भारत में कंप्यूटर की भाषाएँ कक्षा 9 से शुरू होती हैं वो भी बच्चे की रूचि पर निर्भर करता है की वो कंप्यूटर विषय पढ़ना चाहेगा या नहीं और नयी नीति में कोडिंग होना बहुत अच्छा है पर क्या आपको नहीं लगता की मूलभूत जानकारी होना ज़्यादा ज़रूरी है।

अब तक मैं सबसे ज़्यादा हैरान थी कि बोर्ड की परीक्षाओं में 90 प्रतिशत से ज़्यादा अंक लाने पर और अभिभावकों की अपने बच्चों से बढ़ती अपेक्षाओं से और खोते हुए बचपन से पर जब से  विज्ञापन देखा है अब लगता है की अभिभावकोंमें होड़ न लग जाये बच्चो को कोडिंग सिखाने की,क्योंकि हो सकता है कि एक बच्चा कोडिंग में रूचि रखता हो और वो सीख भी जाये और एप्लीकेशन बना भी ले पर ज़रूरी नहीं कि हर दूसरे बच्चे को भी कोडिंग में रूचि हो और अभिभावकों को भी यहाँ पर ध्यान देने कि ज़रूरत है कि अगर आपके परिचित का बच्चा कोडिंग में रूचि ले रहा है तो हो सकता है आपके बच्चे कि रूचि किसी और क्षेत्र में हो और उसे वही करने के लिए प्रोत्साहित कीजिये क्योंकि आप दूसरो कि देखादेखी में आप अपने बच्चे का बचपन न गवाएं,उसके बचपन के अनमोल पलों को जी लीजिये उसके साथ,उसकी ख़ुशी को महसूस कीजिये जो उसे आपके साथ खेलने से मिलती है ,उसकी नाराज़गी को महसूस कीजिये जब वो आपसे हार जाये ,उसे खेल खेल में ज़िन्दगी के सबक आप ही सिखा सकते हैं ,क्योंकि बाकि शिक्षा वो अपने समय से सीख ही लेगा पर कहीं आपकी अपेक्षाओं के बोझ तले दब कर वो ज़िन्दगी कि चुनौतियों के आगे ही हार न मान जाये क्योंकि अभी सही समय है उसके व्यक्तित्व के विकास का ,उसके मानसिक विकास का ,उस सीख का जो सिर्फ आप उसे दे सकते हैं ,कभी हार नहीं मानने की ,ज़िन्दगी की चुनौतियों का डट के सामना करने कि,खुश रहने की ,क्योंकि आज के समय में डिप्रेशन आम समस्या हो गयी है ,आप अपने बच्चों दिमाग का विकास तो कर रहे हैं और वो भी समय से पहले पर उसके मानसिक विकास को आप भूले जा रहे हैं।
बहुत ज़रूरत है अपने बच्चों को मानसिक रूप से सशक्त बनाने की और ये संभव है सिर्फ आप के प्यार और सहयोग से ,अपने बच्चों को अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से बाहर निकालिये, उसे स्वस्थ वातावरण दीजिये।
अभी एक और मज़ेदार बात जो मैंने देखी वो है टिकटॉक पर बच्चों के वीडियो और उनके हाव भाव देख कर लगता है कि कोई वयस्क सामने है ,और उनके माता पिता वो वीडियो शेयर करते हैं पर मैं ये नहीं समझ पाती कि उनके खुश होने का कारण क्या है ,अपने बच्चे का बचपन खोना या फिर समय से पहले उसका अपनी उम्र से ज़्यादा उम्र की तरह व्यवहार करना।
इस सब में कहीं न कहीं हम अपने बच्चों का बचपन खो रहे हैं ,इसलिए सभी अभिभावकों से मुझे बस यही कहना है कि अपने बच्चों से उतनी ही उम्मीद रखे जितना आप अपने बचपन में कर पाते थे, यहाँ पर ये तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि समय बदल रहा है ,आप समय के हिसाब से बदलिए पर बच्चों को उम्र से पहले ही बड़ा मत कीजिये।
इस विषय पर सबके अपने अपने विचार हो सकते हैं, मैंने अपने विचार आपके सामने रखने की छोटी सी कोशिश की है।
धन्यवाद।

10 thoughts on “कोडिंग और बचपन

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